Anarcho-environmentalism allegorised

The name Anaarkali in the present context has many meanings - Anaar symbolises the anarchism of the Bhils and kali which means flower bud in Hindi stands for their traditional environmentalism. Anaar in Hindi can also mean the fruit pomegranate which is said to be a panacea for many ills as in the Hindi idiom - "Ek anar sou bimar - One pomegranate for a hundred ill people"! - which describes a situation in which there is only one remedy available for giving to a hundred ill people and so the problem is who to give it to. Thus this name indicates that anarcho-environmentalism is the only cure for the many diseases of modern development! Similarly kali can also imply a budding anarcho-environmentalist movement. Finally according to a legend that is considered to be apocryphal by historians Anarkali was the lover of Prince Salim who was later to become the Mughal emperor Jehangir. Emperor Akbar did not approve of this romance of his son and ordered Anarkali to be bricked in alive into a wall in Lahore in Pakistan but she escaped. Allegorically this means that anarcho-environmentalists can succeed in bringing about the escape of humankind from the self-destructive love of modern development that it is enamoured of at the moment and they will do this by simultaneously supporting women's struggles for their rights.

Friday, April 3, 2026

एक फरेबी ज़िंदगी का सफरनामा

 

पाँच साल की उम्र में मैं आसाम से कोलकाता नाना नानी के यहाँ या गया था पढ़ाई के लिए। और फिर 18 साल की उम्र तक वहीं रहा। बीच में करीब डेढ़ साल के लिए सात साल से आठ साल के उम्र तक मैं छात्रावास में रहा बाकी इस लंबी अवधि में मैं नाना नानी के यहाँ ही रहा। नानी मुझे मोहल्ले के दूसरे बच्चों के साथ खेलने नहीं देती थी यह सोचकर कि मैं बिगड़ जाऊंगा। इसलिए शुरू से ही मैं पढ़ाई में बहुत ध्यान देता था। केवल स्कूल की पढ़ाई ही नही बल्कि पाठ्यक्रम से अतिरिक्त पुस्तकें भी पढ़ता था। इसी कारण मैं शुरू से अकेलापन में जिया हूँ और मेरे सोच पुस्तकों से बनी है।

इस बीच डेढ़ साल जरूर छात्रावास में एक अलग माहौल मिला पर तब तक अकेलापन की आदत पड़ गई थी इसलिए मैं वापस नाना नानी के यहा आ गया। छात्रावास में कुछ दूसरे लड़कों से मैं हस्त मैथुन करना सीख गया एवं इसके बाद से यह मेरा जीवन का अंग बना रहा।

मेरे दस ग्यारह साल की उम्र में मेरे आस पास में नक्सल आंदोलन का बोलबाला था। हमारे मोहल्ले का एक युवक इस आंदोलन में शामिल होकर घर से फरार हो गया। साथ ही मेरे नयाँ के सबसे छोटे भाई भी अपनी नौकरी छोड़कर इस आंदोलन में शामिल होकर जेल चला गया था। इस सब से मैं बहुत प्रभावित हुआ। साथ ही मैं ने की ऐसे पुस्तके पढ़ी जिनमें अन्याय के खिलाफ लड़नेवालों की कहानियाँ थी। इसलिए मुझे तेरह साल की उम्र से ही समाज में व्याप्त अन्याय से लड़ने की एक इच्छा जाग गई हालांकि मैंने तुरंत इस दिशा में कुछ किया नहीं एवं पढ़ाई ही करते रहा।

हमारे स्कूल में एक ईसाई प्रचारक आते थे प्रवचन देने एवं बताते थे कि कैसे वे गरीबों के उत्थान के लिए समाज कार्य करते थे। उनसे प्रेरित होकर मैंने उनके साथ उनके समाज कार्य में भाग लिया था। इसके तहत मैं गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम करता था और कभी कभी वृद्धाश्रम में जाकर बूढ़े लोगों से बात कर उनको मदद करता था।

घर में पुस्तकों के साथ बंद रहने के कारण मेरा अकेलापन के साथ साथ पुस्तकों की दुनिया मेरे लिए और वास्तव हो गया था।

मैंने छुट्टियों में माँ बाप के पास असम जरूर जाता था एक महीने के लिए गर्मी और ठंड के मौसम में पर उसका असर ज्यादा नहीं रहा। एक बार ऐसे ही एक छुट्टी के समय एक आदमी ने मुझे उसके घर ले गया और मेरे लिंग पर हाथ फेरने लगा। मुझे अच्छा लगा और फिर उसने मेरे पैन्ट उतारकर मेरे कूल्हे में उसके लिंग डालकर मैथुन किया। उस समय मेरे उम्र केवल 12 साल का था और मुझे अच्छा ही लगा। पर मैं फिर कभी उसका घर नहीं गया और खुद हस्त मैथुन करते रहा।

मेरा चरित्र इसलिए अकेलापन का है। कोई बहुत गहरे दोस्त नहीं बने मेरे। स्कूल में हालांकि रजत रॉय के साथ मार्क्सवाद को लेकर और वेंकट रामस्वामी के साथ दुनिया भर के न्याय के संघर्षों को लेकर बहुत बातें होती थी।

तो एक तरफ सामाजिक न्याय के लिए लड़ने की इच्छा थी और दूसरी तरफ यौन वासना हस्त मैथुन के कारण तेज हो गई थी पर दोनों में ही कोई वास्तविक कदम स्कूली जीवन में नहीं उठाया और एक अकेला इंसान में तब्दील हो गया।

नाना नानी या माँ बाप, किसीसे भी मेरा करीब का प्यार का संबंध नहीं था। एक बच्चे को जो घनिष्ट प्यार मिलना चाहिए वह नहीं मिल मुझे। हाँ खाना पीना पहनाव आदि पर्याप्त मिलता था पर घनिष्टता और मानसिक शारीरिक निकटपन यह नहीं मिला मुझे। इस कारण भी मेरे अंदर एक अकेलापन था। ऐसा था कि माँ बाप और नाना नानी जिम्मेदारी निभा रहे थे कि बच्चे को पालकर बड़ा करना है पर पाँच साल की उम्र से अठारह साल की उम्र तक कोई निकटता नहीं महसूस हुई मुझे मेरे पालकों से। यह ही मेरे बाद के जीवन में मेरे चरित्र का सूखेपन का कारण है। मैं एक ही साथ समाज के न्यायहीनता के शिकार लोगों के प्रति सहानुभूति रखता था और करीब के लोगों के प्रति उदासीन भी था। निःस्वार्थ सेवभाव भी था और स्वार्थी इच्छाएं भी थी। मेरी यह इच्छा होती थी कि मैं बहुत अमीर बनूँगा या बहुत अच्छा खिलाड़ी बनूँगा और नाम कमाऊँगा।

दोनों प्रभावों के कारण मेरा चरित्र में विरोधाभास था और आज भी है। क्योंकि मैं पढ़ाई में अव्वल था इसलिए एक अहंकार था कि मैं बहुत ऊंचे दर्जे का व्यक्ति बन पाऊँगा अपने वयस्क जीवन में और इसको लेकर तरह तरह के सपने भी देखते रहता था। कभी सपना देखता था कि एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक बनकर नोबेल पुरस्कार जीतूँगा तो कभी सपना देखता था कि मैं देश का शासक बनकर बहुत लोगों का भला करूंगा।

महाविद्यालय में जाकर मैंने पहले तीन साल पढ़ाई और खेल कूद में व्यस्त रहा। हस्त मैथुन जारी था पर क्योंकि उस समय महाविद्यालय में बहुत कम लड़की विद्यार्थी थी इसलिए मुझे किसी लड़की से दोस्ती करने का अवसर नहीं मिला। चौथे वर्ष में मैंने दर्शन पढ़ना शुरू किया और खेल कूद से विदा ले लिया। इसके बदले में ध्यान साधना में समय लगाने लगा। उपनिषदों को पढ़ा और उसमें बताए गए दर्शन से प्रभावित हुआ। मुख्य रूप से सच्चाई और त्याग पर जो बाते है उपनिषदों में उस पर अमल करने की प्रेरणा मिली। यहाँ तक कि एक व्यक्त 1982 में मैंने पढ़ाई छोड़कर किसी आश्रम में जाकर पूर्णकालिक रूप से ध्यान साधना करने का भी गंभीरता से सोचा पर आखिरकार सब कुछ त्यागने की हिम्मत नहीं हुई।

समाज सेवा भी करने लगा जिसके तहत मैं महाविद्यालय के आस पास के आदिवासी गाँव में जाकर वहाँ के बच्चों को पढ़ाता था। और नक्सली गुटों के बैठकों में भी जाने लगा। हालांकि यह गुट उस समय सशस्त्र कार्यवाही नहीं कर रहे थे और संविधान के दायरे में ही काम कर रहे थे। इनकी बैठकों में बात होती थी कि सशस्त्र क्रांति लाने के लिए जो सशक्त जन संगठन चाहिए था वह मौजूद नहीं था इसलिए संविधान के दायरे में रहकर लोगों को संगठित कर उनके हकों के लिए लड़ना है। 

ऐसे दो साल बिताने के बाद मैं महाविद्यालय की पढ़ाई खत्म करने के पश्चात कोई नौकरी नहीं की। बल्कि मेरे माता पिता के लिए शांतिनिकेतन में उनका मकान बनाने की जिम्मेदारी उठाई 1984 में। इस काम को मैं दो साल तक किया। उस दौरान मैं दर्शन और राजनीति के और पुस्तकें पढ़ी। इस प्रकार एक तरफ मैं योग साधना में समय लगाया तो दूसरी तरफ मैं ग्रामीण स्तर पर पूर्ण कालिक रूप से संगठनात्मक कार्य करने के अवसर ढूँढने लगा।

1985 में मैं ग्रामीण संगठनात्मक कार्य के लिए मध्य प्रदेश में अलीराजपुर पहुँचा। उस समय तक मैं उपनिषद, गीता और गांधी, मार्क्स आदि के पुस्तकों के बहुत अध्ययन कर चुका था। इसलिए उस व्यक्त मैं ते किया कि ज़िंदगी भर एकल रह कर केवल ग्राम स्वराज स्थापित करने का ही काम करूंगा।

इसके बाद 1991 तक मैं डट कर ग्रामीण संगठनात्मक कार्य किया और साथ ही योग साधना भी करते रहा। पर फिर भी मेरे यौन वासनाए बीच बीच में उफान पर आ जाती थी और मैं हस्त मैथुन करता था। गीता और उपनिषद पढ़ने से और योग साधना से कुछ समय तक वासनाए दब जाती थी पर फिर विस्फोट हो जाता था।

इसी समय एक शादीशुदा महिला अलीराजपुर आई उसके पीएचडी के अध्ययन के लिए सर्वेक्षण करने और वहाँ एक गाँव आंजनबारा में रहने लगी। पहले उससे मेरी दोस्ती हो गई और फिर उसके साथ यौन संबंध में फंस गया। मेरे आध्यात्मिक योग साधना पूरी तरह से ध्वस्त हो गया। इतने सालों से मैं मेरी वासना को साधना द्वारा नियंत्रित कर रहा था पर अब वह पूरी तरह बेलगाम हो गई। साथ ही मैं बड़ोडा में एक और महिला के साथ भी यौन संबंध करने लगा। इन दोनों महिलाओं से बारी बारी से यौन संबंध चलते रहता था। यह सब किसी भी प्रकार के प्रतिबद्धता के बिना हो रहा था। यानि कोई स्थाई रिश्ता के बिना केवल यौन संबंध ही इसका आधार था।  इस प्रकार मेरे लिए मेरे वासनाओं को नियंत्रित करने की एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई। मुझे लगा कि किसी एक महिला के साथ एक स्थायी संबंध में बंधना होगा नहीं तो बहुत बुरा परिणाम हो सकता है।

समस्या यह थी कि मैं अलीराजपुर में मेरा संगठनात्मक काम को छोड़ना नही चाहता था और मुझे कोई ऐसी महिला नहीं मिल रही थी जो मेरे साथ यह काम को करेगी। यौन वासना को पूरी करनी थी पर उसके चलते मेरा काम नहीं छूटना चाहिए था। संगठनात्मक काम मेरे लिए और महत्व रखता था यौन वासना की तुलना में। इसलिए मैं शुरू से ही यौन वासना को दबाने की कोशिश की पर ऐसा हो नहीं पाया। मेरे सामने मामा बालेश्वर दयाल का उदाहरण था जिन्होंने जीवन पर्यंत आदिवासी संगठन के काम पर केंद्रित रहा और शादी नहीं की। पर क्योंकि मैं यौन संबंध में फंस गया इसलिए मामाजी के नक्शे कदम पर चलने के लायक नहीं रहा।

एक समाधान यह था कि मैं किसी आदिवासी लड़की से शादी कर लूँ। परंतु मुझे उस समय कोई पढ़ी लिखी आदिवासी महिला नहीं मिली जो संगठन के काम में रुचि रखती हो। यह भी था कि क्योंकि मैं आदिवासियों के बीच संगठनात्मक काम में लगा हुआ था इसलिए मुझे लगा कि मैं किसी आदिवासी लड़की से शादी नहीं कर सकता जिससे कि संगठनात्मक काम मे बाधा उत्पन्न हो। केवल यौन वासना को पूरी करने के लिए किसी अनपढ़ आदिवासी लड़की से शादी करना मुझे ठीक नहीं लगा।

1991 में नर्मदा बचाओ आंदोलन की संघर्ष यात्रा आयोजित की गई जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। उस समय एकता परिषद के कुछ कार्यकर्ता धार जिले के डही जनपद में संगठनात्मक कार्य करने के लिए आए थे। मेधा पाटकर के अनुरोध पर एकता परिषद के यह कार्यकर्ता बड़वानी क्षेत्र में आए थे संघर्ष यात्रा की तैयारी में मदद करने के लिए। हम जब अलीराजपुर में संघर्ष यात्रा में शामिल हुए तो हमारी मुलाकात एकता परिषद के इन कार्यकर्ताओं से हो गई।

एकता परिषद के एक महिला कार्यकर्ता, सुभद्रा, मुझे बहुत पसंद आई। मैंने उसको यात्रा के प्रतिभागियों को संगठित करते हुए देखा और उसके संगठन बनाने की कार्यशैली से बहुत प्रभावित हो गया। इसके अलावा संघर्ष यात्रा के बाद आयोजित ग्राम गांगपुर के एकता परिषद के एक प्रशिक्षण शिविर में सुभद्रा ने वरिष्ट संचालाकों से जिस प्रकार बहस की वह भी मुझे प्रभावित किया। मुझे लगा कि वह ही मेरे जीवन साथी बन सकती है।

मैंने सुभद्रा को एक पत्र लिखा कि मुझे उससे दोस्ती करनी है जिसका कोई जवाब नहीं आया। फिर मैंने उससे मिलने गया उसके कार्यस्थल रतलाम जिले के एक गाँव में। उस समय वह डही में बीस कार्यकर्ताओं को व्यवस्थित कर वहाँ से निकलकर रतलाम में संगठन के विस्तार के कार्य के लिए दो कार्यकर्ताओं के साथ जा चुकी थी। शुरू में वह बहुत नाराज थी कि काम के बजाय मैं दोस्ती की बात कर रहा हूँ। पर धीरे धीरे दोस्ती हो गई और हमारे बीच यौन संबंध हो गया।

उसके बाद की आंदोलनों में हम मिले और अंततः 1993 में हम भोपाल में कलेक्टर कार्यालय में सिविल मेरिज कानून के तहत शादी किए। मैंने शुरू में शादी के पक्ष में नहीं था पर सुभद्रा ने काही कि समाज में मान्यता जरूरी है और इसलिए विधि अनुसार शादी करनी पड़ेगी। शादी में हमारे कुछ दोस्त शामिल हुए और रामचन्द्र भार्गव जी जो उस समय गांधी भवन के संचालक थे और उनकी पत्नी रुक्मिणी जी ने बहुत मदद की। यह दोनों वरिष्ट समाज सेवक हमारे लिए माता पिता की भूमिका निभायी।

शादी के बाद भी हम अलग अलग रह रहे थे। सुभद्रा रतलाम में और मैं अलीराजपुर में जिसकी बीच की दूरी 250 किलोमीटर थी। इससे दिक्कत हो रही थी। हम साथ नहीं रह पा रहे थे। केवल बीच बीच में मिलते थे। हमारे रिश्ता यौन संबंध आधारित था और हम एक दूसरे के बारे में ज्यादा कुछ जानते नहीं थे। साथ साथ अधिक समय बिताए बिना एक दूसरे को जानना संभव नहीं था। इसलिए हम ने तय किया कि हम एक साथ अलीराजपुर में रहेंगे।

एक बार सुभद्रा रतलाम से अलीराजपुर आई जब मैं कुछ काम में व्यस्त था। उसने मुझे काम छोड़कर उसके साथ समय बिताने के लिए कही तो मैंने कहा कि काम छोड़कर उसके साथ प्रेम प्यार करते बैठे नहीं रह सकता हूँ। इससे हमारा पहला झगड़ा हो गया और सुभद्रा ने अपने मंगल सूत्र समेत सारे जेवरों को फेंककर वापस डही चल दी। सुभद्रा ने एक भावनात्मक गहरा रिश्ता स्थापित करने को मांगी तो मैंने कहा कि शादी और सिद्धांत के बीच मुझे चुनना है तो मैं सिद्धांत को चुनूँगा। इस बात से सुभद्रा बहुत नाराज हो गई।

यह ही हमारा रिश्ता का प्रमुख बाधा रहा है कि मैं रिश्ते के ऊपर सिद्धांत और काम को महत्व देते रहा हूँ। और काम भी अलीराजपुर का काम। उस बार तो बाद में मैं डही जाकर सुभद्रा को मना लिया था पर यह बात आड़े आते रही कि मैं उम्मीद करता था कि सुभद्रा एकता परिषद का काम छोड़कर  मेरे साथ अलीराजपुर आकार काम करेगी। कुछ समय के लिए सुभद्रा ऐसे किया भी और हम दोनों सोनडवा में इंदिरा आवास के एक कुटीर में रहने लगे। कुछ सामान खरीदकर उस कुटीर में हम गृहस्थी बसाये थे।

परंतु जब हम क्षेत्र में संगठन के कार्य के लिए जाते थे तब सुभद्रा को लगा कि क्षेत्र बहुत कठिन है क्योंकि पहाड़ो में बहुत चलना पड़ता था। इसके अलावा आदिवासी एकता परिषद के प्रभाव के कारण अलीराजपुर के आदिवासी कार्यकर्ता शंकर ने कह दिया कि हम जैसे बाहरी माध्यम वर्गीय कार्यकर्ताओं की कोई आवश्यकता नहीं है और वह खुद संगठन को चला लेंगे।

कुछ समय के लिए हम धार जिले में एकता परिषद के क्षेत्र में भी काम करने के लिए गए पर वहाँ भी ठीक से काम करने का नहीं बना। एकता परिषद के कार्यकर्ता चाहते नहीं थे कि मैं उनके क्षेत्र में रहकर काम करूँ।

तब हमने तय किया कि हम किसी नए क्षेत्र में काम शुरू करेंगे एक साथ। उस समय मैं लगातार मलेरीया से आक्रांत हो रहा था। इंदौर में जब डॉक्टर ने जाच की तो उन्होंने बताया कि मुझे अलीराजपुर से निकलकर आना होगा और छह महीने तक इलाज करना होगा और इस दौरान हर समय मच्छर दानी में सोना होगा। यह अलीराजपुर में नहीं हो सकता था। इसलिए भी अलीराजपुर से निकलना पड़ा। बाबा आमटे से पाँच सौ रुपये मदद मांगकर हम इंदौर के पास ग्राम माचला स्थित ग्रामोद्योग विद्यालय के परिसर में हम दोनों रहने लगे। वहाँ भी मैं एक दो बार मलेरीया से पीड़ित हुआ पर छह महीने के अंदर आखिर मुझे इस बीमारी से छुटकारा मिला।

माचला में रहने के लिए उत्तम सुविधाएं थी पर हमारे पास पैसे नहीं थे। जैसे वैसे हम अलीराजपुर के संगठन द्वारा प्रकाशित नई चेतना पत्रिका दो दो रुपये में बेचकर जी रहे थे पर यह पर्याप्त नहीं था। दोस्तों से और माँ और भाई से पैसे मांगकर भी हम ने कुछ हद तक गुजारा किया। आश्रम के निवासी मुनिजी के रैशन कार्ड से केरोसीन लाते थे और स्टोव पर खाना बनाकर खाते थे। भले ही अभाव में जीते थे पर आपस में बहुत प्रेम था और वे बहुत अच्छे दिन थे।

फिर हम को एक अध्ययन करने का प्रोजेक्ट मिला जिससे हम कुछ पैसे कमाए। इससे केवल हमारा गुजारा ही नहीं हुआ बल्कि हम ने एक कंप्युटर और प्रिंटर भी खरीद लिया जिससे कि आगे भी इस तरह का शोध प्रोजेक्ट मिलने के लिए सुविधा हो गई।

माचला में दो साल तक रहे हम और बहुत एक दूसरे से प्यार किए और आनंद दिए। यह बहुत अच्छे दिन थे हमारे लिए। इसी समय मैं बहुत लेखन किया जो जर्नलों में प्रकाशित हुए और इससे भी शोध प्रोजेक्ट के माध्यम से पैसे कमाने के जरिए बनने लगे। इसी क्रम में एक अमरीकी फेलोशिप हम दोनों को मिल गया महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए। यह अमरीकी फेलोशिप हमारी वित्तीय स्थिति को काफी मजबूत कर दिया।

1996 में इस फेलोशिप का काम करने के लिए हम माचला से खरगोने जिले के काटकूट गाँव चले गए। वहाँ एक आदिवासी मोहल्ले में घर बनाकर हम रहने लगे। काटकूट क्षेत्र में गैर आदिवासी लोग आदिवासियों का बहुत दमन और शोषण करते थे। पर समस्या यह थी कि अगर आदिवासियों को संगठित करने का काम करते तो फेलोशिप के अनुसार महिला स्वास्थ्य का काम ठीक से न हो पाता।

सुभद्रा का कहना था कि महिला स्वास्थ्य का ही केवल काम करे और अलीराजपुर के तर्ज पर आदिवासियों को संगठित करने का काम न करे। इसी से हमारे बीच विवाद की स्थिति बन गई। फेलोशिप मिलने से संगठन के पुराने साथी सब कहने लगे कि मैं अमरीकी पैसे से बिक गया हूँ और संगठनात्मक काम से मुह मोड लिया हूँ। यह आरोप मुझे बहुत खलने लगा। इसलिए सुभद्रा के मनाही के बावजूद मैं संगठनात्मक काम को आगे बढ़ाया और उसमें सुभद्रा भी शामिल हो गई। इसमें हम दोनों ही जेल गए और हमारे ऊपर बहुत सारे आपराधिक प्रकरण कायम कर दिए गए। हालांकि इससे हमारा काफी प्रचार हुआ पर क्योंकि सुभद्रा को यह पसंद नहीं था इसलिए हमारे झगड़े भी बहुत हुए। हालांकि सुभद्रा ने भी संगठनात्मक काम किया पर वह इसको लेकर बहुत नाराज थी। अलीराजपुर छोड़कर भी मैं उस तर्ज पर काम किया सुभद्रा के मर्जी के खिलाफ यह उसको अच्छा नहीं लगा।

यह काम को लेकर झगड़ा आज भी चल रहा है। काटकूट और पांडुतालाब के आदिवासी लोग संगठन बनाकर सरकार के खिलाफ इतने अधिक लामबंद हो गए कि अंततः सरकार पूरी ताकत लगाकर 2001 में संगठन को तोड़ डाला जिसमें कि मैंने ढाई महीना तक जेल में रहा और संगठन के चार साथी पुलिस की गोली से मार दिए गए।

इस सब से भी सुभद्रा बहुत नाराज हो गयी क्योंकि तब तक हमारा पुत्र ईशान का जन्म हो गया था और उसको लेकर उसे भागना पड़ा जिससे उसे बहुत तकलीफ हुई। इस प्रकार मेरे काम की नशा में पागल होना ही हमारे रिश्ते में दरार पैदा कर दिया।

इसके बाद कुछ समय तक हमने काम छोड़ दिया क्योंकि एक तरफ सरकारी दमन बहुत अधिक था और दूसरी तरफ हमारा एक बच्चा भी हो गया था। उस बच्चे को लेकर ही सुभद्रा को पेशी जानी पड़ती थी। इंदौर में जिस मकान में हम किराये से रहते थे उसके मालिक को पुलिस वालों ने धमकी दी कि हमें किराएं से मकान न दे। इसलिए आखिर हमें इंदौर में खुद का मकान बनाकर रहना पड़ा 2002 में।  

मकान बनाने में सारे पैसे खत्म हो गए। एक बार फिर हम वित्तीय परेशानी में आ गए। अभी एक बच्चा भी था हम दोनों के अलावा। यहा वहा हात मार कर मुझे एक अध्ययन के पैसे मिले और स्थिति कुछ ठीक हो गई। मैंने एक लैपटॉप कंप्युटर खरीद पाया जिससे कि वापस पैसे कमाने का जरिया बन गया।

पर झगड़े की स्थिति बनी रही क्योंकि रिश्ते में काम को लेकर झगड़ा चलते रहा। बच्चे की परवरिश और पुनः पढ़ाई शुरू करने के कारण सुभद्रा को घर में ही रहना पड़ता था और मैं काम पर घूमता था। 2008 में मुझे एक अध्ययन का प्रोजेक्ट मिला जिसे करने के लिए मुझे अलीराजपुर की संस्था ढास ग्रामीण विकास केंद्र को पुनर्जीवित करना पड़ा। इससे अलीराजपुर आने जाने का सिलसिला फिर से प्रारंभ हो गया और झगड़ा बढ़ने का कारण बन गया।

इसके बाद ढास में पहले टाटा ट्रस्ट का पैसा आया 2008 में आप्रवासी मजदूरों के हक के लिए काम करने के लिए और बाद में 2011 में एक्शन ऐड से पैसे आए आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने हेतु। इसे करने के लिए अक्सर मुझे अलीराजपुर जाना पड़ता था और कभी कभी सुभद्रा भी जाती थी। इसके बाद स्वपन भट्टाचार्य को लेकर मैं ककराणा स्कूल में गया और वह वही रहने लगे। इसके कारण भी मेरा अलीराजपुर आना जाना और बढ़ गया।

असल में शादी के रिश्ते में यौन संबंध के अलावा सुभद्रा के प्रति सच्चा प्यार मेरे में नहीं था। न केवल काम में व्यस्त रहता था बल्कि सुभद्रा को कोसते रहता था कि वह काम नहीं करती और मुझे भी काम नहीं करने देती। काम के वजह से एक दूसरे को जान नहीं पाए ठीक से और यह ही सिलसिला शुरू से अंत तक जारी रही।  

इधर सुभद्रा को पीएचडी में दाखिला नहीं मिल रहा था। बहुत कोशिश किए पर दिल्ली, मुंबई, इंदौर और उज्जैन कहीं भी दाखिल नही मिला। उधर अलीराजपुर के साथी ढंग से काम नहीं कर रहे थे तो मेरे ऊपर एक्शन ऐड प्रोजेक्ट को संभालने का काम अधिक हो गया था। इस सब से चिढ़ कर सुभद्रा ने मुझे ढास और अलीराजपुर से अलग होने के लिए कही और मैं वहाँ से अलग हो गया।

इस पूरे समय में 2008 से 2015 तक मैं ने बहुत कन्सल्टन्सी किया जिसमें काफी पैसा कमाया। इसी समय मैं फेस्बूक में लिखना शुरू किया जिससे प्रभावित होकर कुछ लोगों ने हमारे काम के लिए पैसे देने लगे। धीरे धीरे यह जोर पकड़ने लगा और फेस्बूक पर लिखना एक नशे की तरह हो गया। इससे लोग अधिक पैसे देने लगे जिससे यह नशा और बढ़ गया। 2015 में सुभद्रा को आखिरकार महू स्थित अंबेडकर विश्वविद्यालय में पीएचडी में दाखिला मिला और वह उसमें व्यस्त हो गई। साथ ही मेरे दबाव के कारण सुभद्रा ने महिला स्वास्थ्य पर काम शुरू किया और फिर बाद में उसी से समझ में आया कि महिला स्वास्थ्य केवल तब ठीक को सकता है जब उनका खान पान ठीक होगा। इसके लिए सही ढंग से जैविक खेती करना जरूरी है। इसी क्रम में फिर सुभद्रा ने 2015 में देवास जिले के पांडूतलाब गाँव में जैविक खेती करना शुरू कर दी। इस प्रकार सुभद्रा काम में बहुत व्यस्त हो गई क्योंकि एक तरफ पीएचडी की पढ़ाई थी तो दूसरी तरफ जैविक खेती का विस्तार का काम था।

इसी समय मेरी यौन वासना बहुत तेज हो गई। इसके कारण मैं ब्लू फिल्म अधिक मात्रा पर इंटरनेट पर देखने लगा। इतना ही नहीं मैं रास्ते चलते युवतियों के स्तनों को देखते रहता था। सुभद्रा और मेरे बीच काम को लेकर झगड़े तेज हो गए थे और दूरी बढ़ गई थी। सुभद्रा का कहना था कि अलीराजपुर का काम छोड़कर केवल पांडूतलाब का काम को करना चाहिए पर मैं ऐसा मानने को राजी नहीं था। तो मैं हस्त मैथुन करके मेरी बढ़ी हुई काम वासना को दिन में तीन चार बार ब्लू फिल्म देखने के वक्त पूरी करता था। एक घर में हम जरूर एक साथ रह रहे थे पर हमारा रिश्ता टूट चुका था क्योंकि मैं उसे जीवित रखने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि अलीराजपुर के काम के चलते मैंने उसमें और व्यवधान डाला।

उस वक्त अगर मैं काम छोड़कर अलीराजपुर जाना बंद कर सुभद्रा के साथ रिश्ता को अच्छा कर लेता तो बात बन जाती। पर मैं फेस्बूक की नशा और अलीराजपुर का मोह को छोड़ नहीं पाया जिसके कारण सुभद्रा के साथ झगड़े बढ़ते गए और दूरी भी। हम एक साथ जरूर रह रहे थे पर एक बहुत बड़ी दूरी बनी हुई थी। ढंग से बात चीत नहीं होती थी आपस में। बस काम पूर्ती बातें होती थी।

इसी प्रकार एक काम चलाऊ रिश्ता चलते रहा हमारे बीच जिसमे बीच बीच में भयानक झगड़े होते थे। गलती पूरी मेरी थी कि मैं अलीराजपुर को छोड़ना नहीं चाहता था और न ही एक प्रेम पूर्ण रिश्ता कायम करना चाहता था।

इस बीच मैं फेस्बूक पर बहुत लिखते रहा और मुझे वाहवाही मिलते रही और साथ ही संस्था में पैसे भरपूर आते रहे। मुझे एक अहंकार सा हो गया कि मैं बहुत वाहवाही कमा सकता हूँ और पैसा भी। इसके बाद 2021 मैं कोविड में अधिक बीमार पड़ा और सुभद्रा ने देखभाल कर मुझे बचाया। पर कोविड के बाद फिर से काम को लेकर सुभद्रा से बहुत बड़ा झगड़ा हो गया। इस प्रकार हालांकि नाम और पैसे बहुत आ रहे थे फिर भी हमारी आपसी रिश्ते लगातार बिगड़ते जा रहा था। मैं अलीराजपुर को छोड़ने के लिए राजी नहीं था।

2021 में कोविड के बाद फेस्बूक पर चेन्नई की एक महिला से दोस्ती हो गई और मैं उससे मिलने फ्लाइट से चला गया। ममल्लापुरम में एक होटल में मैं उसके साथ यौन संबंध स्थापित किया। यह बहुत बड़ी गलती थी। ब्लू फिल्म देखकर हस्त मैथुन कर यौन वासना पूरी नहीं हो रही थी तो लालच में आकार मैंने उस महिला के साथ यौन समबंध स्थापित कर लिया। यह चार साल तक चलते रहा जिसके दौरान मैं 5 बार चेन्नई गया यौन संबंध के लिए।

झगड़े सुलझाकर रिश्ते को मजबूत करने के बजाय झूठ और फरेब का सहारा लेकर अनैतिक यौन संबंध का मज़ा लेने लगा। रिश्ते को मजबूत करने के बजाय दूरी को लगातार बढ़ाते गया ताकि जीवन की विलासिता और काम वासना को भोग सके। कान्फ्रन्स में पेपर पढ़ने जा रहा हूँ ऐसा झूठ बोलकर चेन्नई यौन संबंध करने जाता था। दो दिन के लिए जाता था और दिन में चार चार बार यौन संबंध करता था हवस पूरी करने के लिए। यौन संबंध को स्थायी स्वरूप देने के लिए मैं ने शादी की थी न कि एक प्रेम पूर्ण रिश्ता बनाने के लिए। जब उस शादी में यौन संबंध बंद हो गए तो मैं झूठ के सहारे दूसरी जगह काम वासना पूरा करने लगा। इस प्रकार शादी में रहकर भी मैं उस शादी की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपनी मस्ती की ज़िंदगी जी रहा था।

2022 में ऐमज़ान से हमारी प्रेम कहानी पर फिल्म बनी। उसमें मैंने एक वफादार पट्टी होने की भूमिका को बखूबी निभाई। पर वास्तव तो यह था कि मैं सुभद्रा से शारीरिक और भावनात्मक रूप से दूर हो चुका था और फिल्म में झूठे किरदार निभा रहा था। यहाँ तक कि फिल्म के शूटिंग के समय के आसपास और उसके रिलीज होने के समय भी मैं चेन्नई जाकर गैर यौन संबंध कर के आया था। यह था मेरी फरेबी की पराकाष्ठा।

मैं सोचता था कि सुभद्रा कभी मेरे ईमेल और मेरे मोबाईल चेक नहीं करती है तो उसको मेरे यह गलत यौन संबंध के बारे में पता ही नहीं चलेगा और मैं ऐसे ही करते रहूँगा। पर आखिर मैं पकड़ा गया 2025 के जुलाई महीने में और मेरे सारे अहंकारी यौन कारनामे सामने आ गए। फिरभी मैं झुकना नहीं चाहता था और अलीराजपुर छोड़ना नहीं चाहता था तो मैं घर से भाग गया। कुछ दिनों बाद मैं वापस आया पर पूरी तरह सुधार की दिशा में जाने के लिए तैयार नहीं था। अपने आप को सुभद्रा के अनुसार चलने को राजी नहीं कर पा रहा था। इसके बदले मैंने सुभद्रा के खिलाफ अलीराजपुर के कार्यकर्ताओं और मेरे भाई को गलत जानकारियाँ दी जिससे कि उसकी इज्जत और कम हो गई। मैं सुभद्रा के प्रति एक बहुत ही क्रूर रुख अपनाया हूँ अपने स्वार्थ और मस्ती को पूरी करने के लिए। इससे उसे बहुत तकलीफ हुई है।

शादी और परिवार की जिम्मेदारियों से भागकर झूठ और फरेब के बल पर आजाद हो कर अपनी अहंकारी मस्ती करना मेरे लिए और जरूरी था। इसलिए एक बार फिर मैं दिसंबर 2025 को घर से अलीराजपुर भाग गया। कुछ दिनों बाद वापस आया पर अभी भी अहंकार को भूल नहीं पा रहा हूँ।

मैंने सुभद्रा से शादी की थी इस उम्मीद से कि वह एकता परिषद को छोड़कर मेरे साथ अलीराजपुर में काम करने आएगी और साथ ही मेरे काम वासनाओं को भी पूरी करेगी। यह एक पुरुषवादी अहंकार था। मैं सोचता था कि मैं एक बेहतर कार्यकर्ता हूँ और हमारा अलीराजपुर का काम एकता परिषद से और अच्छा है। यह पुरुषवादी अहंकार लगातार बना रहा हालांकि मैं बाद में अलीराजपुर छोड़कर इंदौर और काटकूट चला गया था सुभद्रा के कहने पर। ऐसा है कि पुरुषवाद और अलीराजपुर में काम करने का मोह कभी मेरे अंदर से गया ही नहीं और मैं लगातार सुभद्रा के प्रति तानाशाही रवैया अख्तियार किया हूँ। इसीलिए मेरे गैर औरत के साथ यौन संबंध पकड़े जाने के बाद भी मैं ने दो बार अलीराजपुर भाग कर गया। यह पुरुषवादी अहंकार ही मेरा पतन का कारण है। तमाम झगड़े के बावजूद भी मैं लगातार सुभद्रा का कहना नहीं माना और मनमानी करते रहा जिससे रिश्ता में बहुत दूरी बन गई है। मैं मेरे यह अविवेकी कृत्य के लिए जिससे सुभद्रा को अत्यधिक कष्ट पहुंचा है, सार्वजनिक तौर पर माफी मांग रहा हूँ।  

 

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